
2 अक्टूबर 2022 को जब देश महात्मा गांधी की जयंती मना रहा था, तब बिहार के पश्चिम चंपारण स्थित भितिहरवा गांधी आश्रम से एक ऐसी यात्रा शुरू हुई जिसने राजनीति की पारंपरिक परिभाषा को चुनौती दी। पिछले 10 वर्षों तक देश के दिग्गज नेताओं और दलों के लिए रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने जब राजनीति के 'चाणक्य' का काम छोड़कर बिहार को सुधारने का संकल्प लिया, तो उन्होंने 'जन सुराज अभियान' की नींव रखी। इसी अभियान के आधार के रूप में उन्होंने पूरे बिहार में 'पदयात्रा' का मार्ग चुना।
यह कोई पारंपरिक चुनावी रैली नहीं थी, बल्कि बिहार की बदहाली को जड़ से समझने, समाज के अंतिम व्यक्ति से संवाद करने और सत्ता के चेहरे नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के परिवर्तन का एक ईमानदार प्रयास था।
"बिहार का संकट 'नेताओं' की कमी नहीं, बल्कि एक 'सही सोच' की कमी है।"— प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर का मानना है कि बिहार पिछले 30-35 सालों से गरीबी और पिछड़ेपन की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। उनके लिए यह पदयात्रा महज सड़क पर चलना नहीं, बल्कि बिहार की बदहाली को जड़ से समझने और समाज के अंतिम व्यक्ति से संवाद करने का एक माध्यम है। उनका स्पष्ट कहना है कि बिहार का संकट 'नेताओं' की कमी नहीं, बल्कि एक 'सही सोच' की कमी है। इसलिए, इस पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य 'सत्ता परिवर्तन' नहीं, बल्कि पूरी 'व्यवस्था परिवर्तन' है।
प्रशांत किशोर के शब्दों में, बिहार के इस पुनर्जागरण के लिए तीन मूल लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
Right People
अभियान का पहला लक्ष्य समाज के उन 'सही लोगों' को ढूंढकर एक मंच पर लाना है, जो ईमानदार और काबिल तो हैं लेकिन बाहुबल और धनबल की राजनीति के कारण पीछे छूट गए। जब तक समाज का सही व्यक्ति राजनीति में नहीं आएगा, व्यवस्था परिवर्तन संभव नहीं है।
Right Thinking
यह केवल नारों की राजनीति नहीं है। 'सही सोच' का अर्थ है बिहार के विकास का एक मुकम्मल ब्लूप्रिंट। पदयात्रा के दौरान अंतिम व्यक्ति से संवाद कर हर पंचायत की समस्याओं को समझा जा रहा है, ताकि अगले 15 वर्षों के लिए 'जनता का एजेंडा' तैयार किया जा सके। यह पटना के वातानुकूलित कमरों का सरकारी कागज़ नहीं, बल्कि गाँवों की ज़मीन से निकली सोच है।
Collective Effort
प्रशांत किशोर अक्सर कहते हैं कि वे केवल एक 'कुम्हार' की भूमिका में हैं। वह अलग-अलग वर्गों से आने वाले अच्छे लोगों को एक मंच पर लाकर बिहार को एक नया रूप देना चाहते हैं, क्योंकि बिहार को सुधारना किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं है; इसके लिए पूरे समाज को संगठित होकर एक सामूहिक प्रयास करना होगा। जब बिहार के लोग अपनी जाति की दीवारों को छोड़कर अपने बच्चों के भविष्य के लिए साथ आएंगे, तभी असली बदलाव शुरू होगा।
करीब 5000 किलोमीटर का संकल्प
करीब 5000 किलोमीटर की इस पदयात्रा में बिहार की बदहाली को जड़ से समझने के बाद समाज का एक बड़ा मंथन हुआ।
यह कोई ऐसी यात्रा नहीं थी जो कुछ दिनों के शोर-शराबे या चुनावी माहौल बनाने के लिए शुरू की गई हो। प्रशांत किशोर ने एक बेहद कठिन संकल्प लिया — हजारों किलोमीटर पैदल चलकर बिहार के हर जिले, हर ब्लॉक और हर पंचायत तक पहुँचना। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि जब तक यह पदयात्रा पूरी नहीं होती, वे घर वापस नहीं जाएंगे। गाँवों की धूल भरी पगडंडियों पर चलना, टेंट में सोना और समाज के अंतिम व्यक्ति से संवाद करना ही इस यात्रा की असली ताकत बनी।
प्रशांत किशोर का मानना है कि बिहार की बदहाली को समझने के लिए एसी कमरों की रिपोर्ट नहीं, बल्कि लोगों के बीच का अनुभव चाहिए। पदयात्रा के दौरान उन्होंने जिस त्रासदी को सबसे करीब से देखा, वो है पलायन। वे अक्सर अपनी सभाओं में तीखी चोट करते हुए कहते हैं, आज बिहार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ का प्रतिभाशाली युवा दूसरे राज्यों में जाकर 'सबसे सस्ता मजदूर' बनने को मजबूर है।
इसी मजबूरी को खत्म करने के लिए उन्होंने 'सही लोगों' को तराशने का काम शुरू किया। वे स्वयं को एक 'कुम्हार' की भूमिका में देखते हैं, जो केवल समाज के बिखरे हुए हीरों को एक मंच पर लाने का जरिया है।
"मैं रास्ता दिखा सकता हूँ, संसाधन जुटा सकता हूँ, लेकिन बिहार में व्यवस्था परिवर्तन करने की असली जिम्मेदारी जनता को खुद उठानी होगी।"
— प्रशांत किशोर
यह पदयात्रा इसी जिम्मेदारी का अहसास दिलाने की एक लंबी तपस्या है।

यह पदयात्रा महज़ एक पैदल मार्च नहीं, बल्कि बिहार के पुनर्जागरण के लिए एक गहरी वैचारिक खोज थी। जैसे-जैसे प्रशांत किशोर गाँवों की धूल फांकते गए, लाखों लोग इस 'जन सुराज अभियान' से जुड़ते चले गए।
करीब 5000 किलोमीटर (अनुमानित) की इस पदयात्रा में बिहार की बदहाली को जड़ से समझने के बाद समाज का एक बड़ा मंथन हुआ। लोगों के बीच से यह प्रबल मांग उठी कि इस 'सही सोच' को केवल एक अभियान तक सीमित न रखकर, एक सशक्त राजनीतिक शक्ति का रूप दिया जाए।
ठीक दो साल के निरंतर जमीनी संघर्ष, लाखों लोगों से जीवंत संवाद और पंचायत स्तर पर एक मज़बूत संगठन खड़ा करने के बाद, इस अभियान ने अपने सबसे ऐतिहासिक पड़ाव में कदम रखा। बिहार के एक करोड़ लोगों ने मिलकर 2 अक्टूबर 2024 को, पदयात्रा की दूसरी वर्षगांठ के अवसर पर, 'जन सुराज' को आधिकारिक तौर पर एक राजनीतिक दल के रूप में परिवर्तित किया।
प्रशांत किशोर ने स्पष्ट किया कि यह दल किसी एक व्यक्ति, जाति या परिवार की जागीर नहीं, बल्कि उन लाखों 'सही लोगों' का एक सामूहिक लोकतांत्रिक मंच है जिन्हें पदयात्रा के दौरान अंतिम व्यक्ति से संवाद कर खोजा और तराशा गया था।
पदयात्रा से शुरू हुआ यह सफर आज केवल सत्ता के चेहरे बदलने के लिए नहीं, बल्कि बिहार में एक पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के माध्यम से नवनिर्माण का एक सशक्त अध्याय बन चुका है।